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अपरिग्रह का पालन श्रावक का भी कर्तव्य – साध्वी प्रशमिता

सकल जैन संघ जैसलमेर द्वारा आयोजित चातुर्मास कार्यक्रम के अंतर्गत साध्वी प्रशमिता महाराज ने प्रवचन माला में कहा कि परमात्मा महावीर द्वारा श्रमण जीवन के पांच महाव्रत बताए हैं।जिनका प्रत्येक जिनमार्गी साधु साध्वी को पालन करना आवश्यक है। परमात्मा के महाव्रतों में सत्य, अहिंसा,अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह प्रमुख है।इन व्रतों का पालन पूर्ण रूप से श्रमण जीवन में आवश्यक है तो श्रावक जीवन में भी आंशिक रूप से इन व्रतों का पालन किया जाना भी जरूरी है। उन्होंने अपरिग्रह पर प्रमुख रूप से बल देते हुए कहा कि अपरिग्रह का पालन करना श्रावक का भी कर्त्तव्य है।यदि कोई एक माह के लिए यात्रा पर जाता है तो साथ में उतना सामान ही ले जाता है जितना यात्रा में आवश्यक है।उसी प्रकार यह जीवन भी एक यात्रा है। लेकिन यहां पर श्रावक वर्ग सात पीढ़ियों जितना परिग्रह करके भी संतुष्ट नहीं है।जितना पास है,उससे अधिक की आश है।परंतु एक सीमा के बाद भौतिक संपत्ति अर्जन का प्रतिबंध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि परमात्मा महावीर ने दीक्षा से पूर्व एक वर्ष तक वर्षीदान किया था। प्रत्येक दिवस एक करोड़ आठ लाख स्वर्ण मुद्राओं का दान कर परमात्मा ने सांसारिक सुखों का त्याग कर आत्मिक सुख की प्राप्ति की।अतः आवश्यकता से अधिक संपदा दान योग्य है।उसका संग्रह पाप कर्म बंधन का कारण बनता है। इसके साथ दान देते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सुपात्र को ही दान दिया जाए।इन व्रतों का पालन करके ही श्रावक जीवन सार्थक किया जा सकता है।साध्वी परमप्रिया महाराज ने धर्म सभा में कहा कि यह जीवन क्षणभंगुर है।समय रहते इस जीवन के महत्व को समझकर धर्म मार्ग में स्वयं को प्रशस्त करना ही मनुष्य जीवन को सफल करता है।इस पंचम काल में हमारा सामर्थ्य बहुत कम है।अतः जितना शक्य हो उतना आत्मा को कर्म रूपी आवरण से मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए। प्रवक्ता पवन कोठारी ने बताया कि प्रवचन के बाद साध्वी भगवंतों ने मांगलिक पाठ सुनाकर सर्व जीव कल्याण की भावना व्यक्त की।दोपहर में श्राविकाओं के लिए विशेष सत्र आयोजित किया गया।जिसमें साध्वी अर्हमनिधि महाराज एवं साध्वी अर्पणनिधि महाराज ने शंका समाधान,सूत्र शुद्धि एवं जिनवाणी के प्रति श्रद्धा भाव रखकर जीवनशैली को उत्कृष्ट बनाने के बारे में बताया। उपस्थित सभी श्राविकाओं ने जिनवाणी के अनुसार कर्म करने के भाव व्यक्त किए।

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