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बीकानेर‘‘सृजन सौरम – हमारे बाऊजी’’ समारोह में नाटकों के रंग-अंश वाचन और तीन भाषा-तीन रंग ने श्रोताओं को भावविभोर किया

THE BIKANER NEWS:;प्रज्ञालय संस्थान एवं श्रीमती कमला देवी-लक्ष्मीनारायण रंगा ट्रस्ट द्वारा देश के ख्यातनाम साहित्यकार, रंगकर्मी, संपादक, अनुवादक और चिंतक कीर्तिशेष लक्ष्मीनारायण रंगा की 93वीं जयंती पर दो दिवसीय ‘‘सृजन सौरम – हमारे बाऊजी’’ समारोह आयोजित किया जा रहा है। समारोह के दूसरे दिन शुक्रवार को उनकी तीन कालजयी कृतियों ‘‘सुमंगली माधवी’’, ‘‘सदियों का सूरज’’ एवं ‘‘भूत’’ के चुनिंदा एवं मार्मिक अंशों का वाचन वरिष्ठ रंगकर्मी दयानंद शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार प्रमोद शर्मा एवं क़ासिम बीकानेरी ने अत्यंत सुंदर, प्रभावी एवं भावपूर्ण शैली में किया। तीनों कलाकारों ने अपने अभिनय और वाणी से रंगा के पात्रों को मंच पर जीवंत कर दिया, जिसे सुनकर श्रोता-दर्शक भाव-विभोर हो उठे।


इसके पश्चात आयोजित ‘‘तीन भाषा – तीन रंग’’ काव्य संध्या में राजस्थानी, हिंदी और उर्दू के कवि-शायरों ने एक से बढ़कर एक उम्दा प्रस्तुति दी। मातृभाषा राजस्थानी की मिठास, हिंदी की ओजस्विता और उर्दू की नजाकत ने ऐसा समां बांधा कि श्रोता देर तक मंत्रमुग्ध हो बैठे रहें।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक डॉ. उमाकांत गुप्त ने कहा कि लक्ष्मीनारायण रंगा को समझना, बीकानेर के सांस्कृतिक इतिहास को समझना है। उनके तीन नाटकों ‘‘सुमंगली माधवी’’, ‘‘सदियों का सूरज’’ और ‘‘भूत’’ में स्त्री-चेतना, इतिहास-बोध और लोक-संघर्ष तीनों एक साथ दिखते हैं। ‘‘सुमंगली माधवी’’ की नायिका आज भी हमें पूछती है कि शुभ क्या है? ‘‘भूत’’ का भूत तो आज भी हमारे सिस्टम में घूम रहा है। रंगा जी ने रंगमंच को ड्राइंग रूम से निकालकर चैराहे पर खड़ा किया। वे आलोचना से नहीं डरते थे, बल्कि आलोचना को रचना का खाद बनाते थे। आज उनकी 93वीं जयंती पर उनका स्मरण हमें यह सिखाता है कि लेखक को सुविधा नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए।
इस अवसर पर समारोह के संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि बाऊजी का रंगमंच मनोरंजन नहीं, जन-जागरण था। उनके नाटक आज भी प्रासंगिक है। आज का यह अंश-वाचन नई पीढ़ी को उनसे जोड़ने का सार्थक प्रयास है।
समारोह में वरिष्ठ शायर, वली गौरी, सागर सिद्दकी, मोहम्मद मोईनुद्दीन मुईन, ने अपनी ताजा गजलों के उम्दा शेर पेश किये तो राजस्थानी की मठोठ के साथ कमल रंगा, डाॅ. गौरीशंकर प्रजापत, इन्द्रा व्यास, विप्लव व्यास, ने नए प्रतीक एवं बिम्ब के साथ अपनी रचनाओं की शानदार प्रस्तुति दी। इसी क्रम में हिन्दी के सौन्द्रर्य से ओत-प्रोत कविताओं का वाचन प्रमोद शर्मा, आनंद मस्ताना, कैलाश टाक, शिवप्रकाश शर्मा, डाॅ. नृसिंह बिन्नानी, गिरिराज पारीक, मदन जैरी, अशोक सैन ने किया।
प्रारम्भ में सभी का स्वागत करते हुए वरिष्ठ शिक्षाविद् राजेश रंगा ने दो दिन के समारोह के सन्दर्भ में बताया।
कार्यक्रम में रंगकर्मी तरूण गौड़, जीत ंिसंह, श्रीमती संगीता शर्मा, श्रीमती संतोष गौड़, साहित्यकार बुलाकी शर्मा, एड. इसरार हसन कादरी, गोपाल व्यास ‘‘कुंठित’’ पुनीत कुमार रंगा, शिव दाधीच, हरिनारायण आचार्य, भवानी सिंह, प्रेम नारायण व्यास, अरूण जे. व्यास, राहुल आचार्य, तोलाराम सारण, हरिकिशन व्यास, चम्पालाल गहलोत, आनंद छंगाणी, अख्तर अली, घनश्याम ओझा, किशन देराश्री, अशोक शर्मा, कन्हैया लाल पंवार सहित अनेक गणमान्य लोगों की साक्षी रही।
कार्यक्रम का संचालन युवा कवि गिरिराज पारीक ने किया। अंत में सभी का आभार वरिष्ठ इतिहासविद् डाॅ. फारूक चैहान ने ज्ञापित किया।

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