पश्चिम बंगाल:-बंगाल में 15 साल का अहंकार कैसे हुआ 30 दिन में चकनाचूर: जनता को ‘गुलाम’ समझने वाली टीएमसी का पतन, भाजपा ने जीता विश्वास


THE BIKANER NEWS:^कोलकाता: पश्चिम बंगाल में 15 साल तक सत्ता के शिखर पर रहने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) का किला महज 30 दिनों के भीतर ताश के पत्तों की तरह ढह गया है। 4 मई को आए विधानसभा चुनाव परिणामों में प्रदेश में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई है। इस करारी हार के बाद अब टीएमसी अपने सबसे बुरे आंतरिक संकट से गुजर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी की इस दुर्दशा का मुख्य कारण उनका अपना अहंकार और जनता के प्रति तानाशाही रवैया रहा है।

अहंकार और धमकियों का जनता ने दिया जवाब
सालों से टीएमसी नेताओं द्वारा आम जनता के साथ ‘गुलामों’ जैसा व्यवहार किया जा रहा था। चुनाव प्रचार के दौरान भी सत्ता के नशे में चूर नेताओं ने जनता को खुलेआम धमकाया और “जीतने के बाद देख लेंगे” जैसी हिंसक बयानबाजी की। वर्षों से इस उत्पीड़न और भय के माहौल में जी रही बंगाल की दुखी जनता ने आखिरकार अपना फैसला सुना दिया। इस चुनाव में जनता ने टीएमसी के तानाशाही रवैये को सिरे से नकारते हुए भाजपा के विजन और नेतृत्व पर अपना पूरा विश्वास जताया है।
30 दिनों में कैसे बिखर गई टीएमसी? (पार्टी का आंतरिक संकट)
चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद अब टीएमसी बगावत की आग में जल रही है। हार का ठीकरा शीर्ष नेतृत्व पर फोड़ा जा रहा है और हालात बेकाबू हो चुके हैं:
- 60 विधायकों की बगावत: प्राप्त जानकारी के अनुसार, करीब 60 विधायकों ने सामूहिक रूप से पार्टी छोड़ने और बगावत करने की चेतावनी दे डाली है।
- ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में विद्रोह: पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के भीतर एक बड़ा विद्रोही गुट तैयार हो गया है, जिसने टीएमसी को विघटन की कगार पर ला खड़ा किया है।
- आई-पैक (I-PAC) और अभिषेक बनर्जी पर फूटा गुस्सा: बागी नेताओं का सीधा आरोप है कि पार्टी जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर रही थी। टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीतियों तक में अभिषेक बनर्जी और ‘आई-पैक’ जैसी कॉर्पोरेट एजेंसियों का दखल हार की मुख्य वजह बना।
सड़कों पर उतरा आक्रोश और भागते उम्मीदवार
पार्टी के भीतर का यह गुस्सा अब सड़कों पर भी नजर आ रहा है:
- अभिषेक बनर्जी पर हमला: सोनारपुर में पार्टी कार्यकर्ताओं के एक आक्रोशित गुट ने खुद अभिषेक बनर्जी की गाड़ी पर अंडों और पत्थरों से हमला कर दिया।
- मैदान छोड़ रहे नेता: पार्टी की हालत इतनी पतली हो गई है कि फालता से टीएमसी के घोषित उम्मीदवार जहांगीर खान ऐन वक्त पर चुनावी मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए और खुद को इस प्रक्रिया से अलग कर लिया।
‘सिगनगेट’ विवाद और केंद्रीय एजेंसियों का खौफ
- जाली हस्ताक्षर (Sign-gate): पार्टी के भीतर जाली हस्ताक्षरों का एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अभिषेक बनर्जी ने महासचिव के रूप में स्पीकर को पत्र लिखकर शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता (LOP) प्रस्तावित किया था, लेकिन विधायकों का आरोप है कि विधायक दल की बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित ही नहीं हुआ था।
- एजेंसियों का डर: कोलकाता नगर निगम (KMC) द्वारा कुछ बागी पार्षदों को भेजे गए नोटिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी केंद्रीय एजेंसियों की बढ़ती सक्रियता ने आग में घी का काम किया है। शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की बढ़ती आक्रामकता के कारण टीएमसी नेता अब अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और पलायन कर रहे हैं।
निष्कर्ष: बंगाल का यह राजनीतिक घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि लोकतंत्र में जब कोई राजनीतिक दल जनता को अपना ‘गुलाम’ समझने की भूल करता है, तो जनता वोट की चोट से उसका अहंकार तोड़ देती है। भाजपा ने बंगाल की जनता के उस दर्द को समझा और यही वजह है कि आज राज्य में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत हुई है।

































