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RTE एडमिशन तो मुफ्त, लेकिन किताबों और यूनिफॉर्म के भारी भरकम खर्च से टूट रही अभिभावकों की कमर!

THE BIKANER NEWS:-​राजस्थान / बीकानेर: प्रदेश में शिक्षा विभाग ने निजी स्कूलों में गरीब बच्चों के प्रवेश के लिए RTE (Right to Education) के तहत कोटा निर्धारित कर रखा है। लॉटरी के जरिए प्रवेश पाने वाले इन छात्रों की फीस और किताबों का खर्च सरकार की तरफ से दिया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। कॉपी-किताबों और स्कूल यूनिफॉर्म के नाम पर RTE के छात्र और उनके परिजन हजारों रुपये चुकाने को मजबूर हैं।

​सरकारी मदद ऊंट के मुंह में जीरा
किताबों के लिए सरकार की ओर से बच्चों के परिजनों के खातों में जो राशि भेजी जाती है, निजी स्कूलों में लगने वाली किताबों और अन्य सामग्री का वास्तविक खर्च उससे कई गुना ज्यादा है।
​समझिए खर्चों का गणित:
​किताबों का खेल: उदाहरण के तौर पर, पांचवीं पास कर छठी कक्षा में आने वाले बच्चे की सरकारी किताबों की बाजार में कीमत 350-400 रुपये तक है। वहीं, निजी स्कूलों द्वारा अनिवार्य की गई किताबों (हिंदी मीडियम) की शुरुआती कीमत ही 700 से 800 रुपये है। अन्य निजी स्कूलों में तो यह खर्च 1000 से 1500 रुपये तक जा पहुंचता है।
​कॉपियां और अन्य सामग्री: केवल किताबें ही नहीं, स्कूल द्वारा बताई गई कॉपियों और अन्य स्टेशनरी का खर्च भी 1500 से 2000 रुपये तक आता है।
​महंगी यूनिफॉर्म: इसके अतिरिक्त स्कूल की तय यूनिफॉर्म, जूते, टाई और बेल्ट भी बाजार में काफी महंगे दामों पर मिलते हैं जो आम आदमी के बजट से बाहर हैं।
​दुकानदारों की मनमानी पर लगे लगाम, पक्का बिल हो अनिवार्य:
इसके साथ ही, शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन को उन चुनिंदा दुकानदारों पर भी सख्ती से लगाम कसनी चाहिए जो निजी स्कूलों की यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य सामग्री का एकाधिकार (Monopoly) लिए बैठे हैं। प्रशासन को तुरंत प्रभाव से यह नियम लागू करना चाहिए कि इन सभी दुकानों पर ग्राहकों को खरीदे गए सामान का ‘पक्का बिल’ देना अनिवार्य हो। पक्का बिल मिलने से मनमाने दामों की वसूली और अभिभावकों के साथ होने वाली इस खुली लूट पर काफी हद तक रोक लग सकेगी।
​सरकार से क्या है मांग?
RTE में अपने बच्चों का दाखिला कराने वाले ज्यादातर परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। ऐसे में सरकार और शिक्षा विभाग को इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लेना चाहिए। RTE के तहत केवल किताबों के नाममात्र रुपये खातों में डालने के बजाय, सरकार को इस महंगाई पर ध्यान देना चाहिए। RTE के बच्चों की किताबों के साथ-साथ यूनिफॉर्म का पूरा खर्च भी सरकार को वहन करना चाहिए और निजी स्कूलों व चुनिंदा दुकानदारों की इस मिलीभगत पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि इन बच्चों को वास्तविक रूप से मुफ्त शिक्षा का अधिकार मिल सके।

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