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सरकारी सिस्टम के तारीखों का जाल में उलझा पीड़ित न्याय के लिए भटकने को मजबूर

THE BIKANER NEWS:-बीकानेर/जयपुर।
राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में फर्जीवाड़े और घोर लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है। यह प्रकरण सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र (CHC) पाँचू में कार्यरत सहायक लैब टेक्नीशियन किशन गोपाल छंगाणी से जुड़ा है। इस मामले ने जयपुर निदेशालय की कार्यप्रणाली से लेकर जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरोपों के अनुसार, सरकारी सिस्टम में ‘दस्तावेज सत्यापन’ महज एक खोखली कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है, जिसके चलते पीड़ित न्याय के लिए सिर्फ तारीखों के जाल में उलझ कर रह गए हैं।
​जयपुर निदेशालय की घोर लापरवाही
​प्रयोगशाला सहायक भर्ती-2018 के दस्तावेजों की प्रक्रिया में निदेशालय स्तर पर बड़ी चूक सामने आई है। वर्ष 2019 में जब किशन गोपाल छंगाणी के दस्तावेज जयपुर निदेशालय पहुंचे, तो बिना किसी गहन जांच और भौतिक सत्यापन के फाइलों को आगे बढ़ा दिया गया। उच्चाधिकारियों की यह अनदेखी विभाग में जवाबदेही की भारी कमी की ओर इशारा करती है।
​अनुभव प्रमाण पत्र और बोनस अंकों में दोहरा मापदंड
​सिविल रिट याचिका संख्या 2851/2022 के दस्तावेजों ने विभाग की दोहरी नीति को बेनकाब किया है।
RTI पर सूचना देने से कतराया निदेशालय
​पीड़ित छंगाणी ने 04/06/2025 को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम-2005 के तहत सिविल रिट याचिका संख्या 8199 से संबंधित जानकारी मांगी। इसके जवाब में जनसूचना अधिकारी ने यह कहते हुए सूचना देने से साफ इनकार कर दिया कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और इससे ‘कोर्ट की कार्यवाही प्रभावित’ हो सकती है। विभाग का यह रवैया उसकी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
​विधिक सेवा प्राधिकरण का ‘संदेहास्पद’ रवैया
​विभाग से निराशा हाथ लगने के बाद पीड़ित ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जोधपुर की शरण ली। प्राधिकरण ने 15/04/2024 को पैरवी के लिए पैनल अधिवक्ता भी नियुक्त किया, लेकिन इसके बाद न्याय प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई:
​तारीखों का अंतहीन सिलसिला: पहली सुनवाई 13/08/2024 को तय थी। अब 21/05/2026 की तारीख बीत जाने के बाद भी मामले का नतीजा शून्य है।
​दस्तावेजों की अनदेखी: पीड़ित द्वारा लगातार ई-मेल, टोल-फ्री नंबर पर शिकायतें और समाचारों की कतरनें भेजने के बावजूद, पैनल अधिवक्ता द्वारा कोर्ट में महत्वपूर्ण दस्तावेजों को मेंशन (प्रस्तुत) ही नहीं किया गया।
​पीड़ित के सीधे आरोप:
जिला विधिक प्राधिकरण बीकानेर और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जोधपुर की इस सुस्ती को लेकर पीड़ित का आरोप है कि यह न्याय दिलाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जानबूझकर किसी ‘व्यक्ति विशेष’ को फायदा पहुंचाने या मामले को दबाने की सोची-समझी अंदरूनी साठगांठ है।
​व्यवस्था से उठते मुख्य सवाल:
​जवाबदेही कब तय होगी? जयपुर निदेशालय के जिन उच्च अधिकारियों ने 2019 में बिना जांचे फाइलों को आगे बढ़ाया, उन पर विभागीय या आपराधिक लापरवाही की कार्रवाई कब होगी?
​पैनल अधिवक्ता की चुप्पी क्यों? गरीबों को मुफ्त विधिक सहायता देने वाला प्राधिकरण खुद कटघरे में है। नियुक्त पैनल अधिवक्ता दस्तावेजों को कोर्ट के पटल पर रखने से क्यों कतरा रहे हैं?
​क्या होगी उच्च स्तरीय जांच? क्या राजस्थान सरकार इस पूरे तंत्र की विजिलेंस जांच कराएगी या लीपापोती का यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा?
​इस पूरे प्रकरण ने साबित कर दिया है कि राजस्थान के चिकित्सा विभाग और विधिक सहायता तंत्र में सब कुछ पारदर्शी नहीं है। यदि समय रहते इस खुलासे पर कड़ा संज्ञान नहीं लिया गया, तो सरकारी व्यवस्था से आम जनता का विश्वास उठना तय है।

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