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मनुष्य की स्वतंत्रता सबसे ज्यादा मूल्यवान है – डॉ. नंदकिशोर आचार्य,अजित फाउंडेशन में हुआ पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम आयोजित

THE BIKANER NEWS:-बीकानेर:-अजित फाउण्डेशन द्वारा आयोजित पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम की अध्यक्ष्यता करते हुए कवि एवं विचारक डॉ. नंद किशोर आचार्य ने कहा कि रामचंद्र गुहा द्वारा कृत पुस्तक ‘‘आखिरी उदारवादी और अन्य आलेख’’ पुस्तक लिखने के पीछे गुहा की वैचारिक दृष्टि रही है। उन्होंने आंकड़ों को न लेकर व्यक्तियों पर वैचारिक दृष्टिकोण को केन्द्र में रखते हुए लिखा। उन्होंने जीवन की समग्रता पर लिखा। हमें भी अपने जीवन में विषय विशेषज्ञ न होकर जीवन के समग्रता पर कार्य करना चाहिए। अगर हम ऐसा नहीं करते है तो हमारा बौद्धिक विकास रूक सकता है। डॉ. आचार्य ने कहा कि यह पुस्तक बहुत ही रोचक है। जब हम यह बात सोचते है कि रामचंद्र गुहा ने इस पुस्तक को लिखकर क्या पाया ? तो हम देखते है कि गुहा ने इस पुस्तक से ‘‘स्वतंत्र सोच’’ के मूल्यों को पाया। पुस्तक में गांधी, नेहरू, विनोबा सहित कई मूल्यवान क्रांतिकारियों एवं विशिष्ट व्यक्यिों के बारें में बहुत ही रोचक ढंग से लिखा गया हैं। गुहा पुस्तक में लिखते है कि ‘‘मनुष्य की स्वतंत्रता’’ सबसे मूल्यवान है। उन्होंने आधुनिकता की ओर बढ़ते कदमों को उल्लेख किया है तो उससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं के बारें में भी इशारा किया है।
कार्यक्रम के विशिष्टि अतिथि इतिहावेता डॉ. भंवर भादानी ने कहा कि रामचंद्र गुहा की पुस्तक में सेवाग्राम का जिक्र बखूबी किया गया। गांधी जी को सेवाग्राम की क्यों आवष्यकता पड़ी उसके बारें में भादानी ने कहा कि सविनय अवज्ञा आन्दोलन के पश्चात उन्होंने सेवाग्राम की स्थापना की जहां उन्होंने निष्ठा एवं अनुशासन से अपने जीवन को निर्वाह करना आरम्भ किया। डॉ. भादानी ने कहा कि गुहा अपनी पुस्तक में लिखते है कि राजनीति एवं विचारधारा दो अलग-अलग पहलू है। राजनीति समय-समय पर बदलती रहती है लेकिन अच्छी विचारधारा लम्बे समय तक कायम रहती है तथा सत्ता परिवर्तन होने के बाद भी हमें अच्छी विचाराधारा के कार्यों को सम्पूर्ण करने चाहिए।
पुस्तक समीक्षा पैनल में सर्वप्रथम महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय की इतिहास विभागाध्यक्ष व साहित्यकार डॉ. मेघना शर्मा ने पुस्तक में संकलित कहीं से 766 किलोमीटर दूर सेवाग्राम शीर्षक के अध्याय पर समीक्षा करते हुए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहासए महात्मा गाँधी की वैचारिक परिणीति, आश्रम जीवन की नैतिक संरचना तथा आधुनिक भारत की सामाजिक सांस्कृतिक चेतना का एक बहुआयामी आख्यान प्रस्तुत किया | साथ ही उन्होंने इस अध्याय को गांधीवादी विरासत का मात्र स्मरण नहीं बल्कि उसके पुनर्मूल्यांकन का एक गंभीर बौद्धिक उपक्रम बताया| अध्याय के महत्वपूर्ण पक्ष पर बोलते हुए डॉ. मेघना ने कहा कि सेवाग्राम आश्रम की दैनिक जीवन पद्धति का विवरण देते हुए लेखक भीष्म साहनी और लुई फिशर के संस्मरणों के माध्यम से अनुशासनप्रधान व्यवस्था, सादगीपूर्ण आवास, सीमित भोजन, व्यक्तिगत श्रम तथा सामुदायिक उत्तररदायित्व की संस्कृति को उद्घाटित किया गया है | उन्होंने कहा जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, जे. बी. कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सरोजिनी नायडू तथा खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेताओं का लगातार सेवाग्राम पहुंचना यह प्रमाणित करता है कि गाँधी की राजनीतिक प्रासंगिकता उनके औपचारिक संगठनात्मक पद से कहीं अधिक व्यापक थी |
इसी क्रम में पुस्तक के दूसरे खण्ड साहित्य पर साहित्यकार एवं राजकीय डूंगर महाविद्यालय के हिन्दी साहित्य के आचार्य डॉ. ब्रजरतन जोशी ने कहा कि रामचंद्र गुहा की आखिरी उदारवादी और अन्य निबंध का दूसरा खंड साहित्य को केवल रचनाओं के सौंदर्य या लेखकों की उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखता। इसके लेख साहित्यकारों, अध्यापकों, आलोचकों, पत्रिकाओं, जीवनी और आत्मकथा जैसी विधाओं तथा पढ़ने की संस्कृति के बीच संबंध बनाते हैं। टी. जी. वैद्यनाथन, शिवराम कारंत, सी. एल. आर जेम्स और सुजीत मुखर्जी के व्यक्तिचित्रों के बाद पत्रिकाओं, जीवनी, लेखन, आत्मकथा, पुस्तक, दुकानों और गांधी के शैक्षिक अभिलेखों पर लेख आते हैं। साहित्य यहाँ एक सामाजिक और बौद्धिक पारिस्थितिकी है, जिसे लेखकए संपादक, पाठक, संस्थाएँ और अभिलेख मिलकर बनाते हैं।
इस दृष्टि को समाजशास्त्री पियरे बूर्दिए के अनुसार साहित्यिक मूल्य केवल रचना के भीतर से पैदा नहीं होता, प्रकाशक, आलोचक, पत्रिकाएँ, अकादमियाँ और पाठक-समुदाय मिलकर तय करते हैं कि किसे साहित्य माना जाएगा और किसे प्रतिष्ठा मिलेगी। गुहा सैद्धांतिक शब्दावली का प्रयोग नहीं करते, पर उनके विषय-चयन में यही अंतर्दृष्टि सक्रिय दिखती है। अंतर यह है कि बूर्दिए इस क्षेत्र को प्रतिष्ठा के संघर्ष और सत्ता के वितरण की दृष्टि से देखते हैं, जबकि गुहा का स्वर प्रायः सहानुभूतिपूर्ण स्मरण का है। यही अंतर इस खंड की शक्ति भी है और सीमा भी।
इसी क्रम में पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए सिस्टर निवेदिता कॉलेज के प्राचार्य .डॉ रीतेश व्यास ने गरीबों के पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल पर आधारित अध्याय पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि अग्रवाल मैकेनिकल इंजीनियर थे और पर्यावरण को लेकर चल रही एक विचारधारा को लोगों तक पहुंचाया जिसमें कहा गया कि गरीब लोगों का पर्यावरण संरक्षण को लेकर होने वाले आंदोलनों में कोई भूमिका नहीं होती। अग्रवाल ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने चिपको आंदोलन से ये समझाया कि पर्यावरण के जिम्मेदारपूर्ण प्रबंधन में गरीबों की भूमिका बहुत बड़ी होती है। व्यास ने कहा कि अग्रवाल ही के प्रयासों से दिल्ली में पेट्रोल के बजाय सी. एन. जी के वाहन चलने शुरू हुए जिसके कारण दिल्ली प्रदूषण मुक्त होने की और अग्रसर हुई। इसी कारण अग्रवाल को वैश्विक स्तर पर खूब पहचान मिली। जल जंगल और जैव विविधता जलवायु परिवर्तन आदि का गहन अध्ययन उनके शोध का हिस्सा था। उन्होंने सुनीता नारायण और अनुपम मिश्र जैसे ख्यात नाम पर्यावरणविदों के साथ काम किया।
वे मात्र 54 वर्ष की आयु में संसार से चले गए। वे हिंदुस्तान टाइम्स के विज्ञान संपादक बने और दिल्ली में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट संस्था की स्थापना की।
कार्यक्रम के अगले चरण में इतिहास विषय के व्याख्याता डॉ. मुकेष हर्ष ने कहा कि गुहा ने पुस्तक में वाजपेयी की नजर में नेहरू आलेख यह बताता है कि समर्थको द्वारा दिया गया सम्मान ही केवल तय नहीं करता बल्कि विरोधियों द्वारा दिया गया सम्मान महत्वपूर्ण होता है इसके अलावा आलेख यह बताता है कि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद, दल और विचारधाराएँ अलग-अलग हो सकती है लेकिन इस चक्कर में हम अपने प्रतिद्वंदी के योगदान और महत्व को कैसे और क्यों नकार दें | इस हिसाब से आज अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे राजनेताओं की आवश्यकता है ।इतिहास का काम किसी को पूर्ण महान व किसी को पूर्ण दोषी घोषित करना नहीं है बल्कि हमें उसके योगदान को समझना है इसलिए एक इतिहासकार के रूप में हमें घटनाओं को प्रमाणो के आधार पर देखना चाहिए, एक नागरिक के रूप में हमें वैचारिक सहिष्णुता बनाए रखनी चाहिए और एक लोकतांत्रिक समाज के सदस्य के रूप में हमें असहमति के अधिकार का सम्मान करना चाहिए लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में नहीं है कि सभी लोग एक जैसा सोचे बल्कि इस बात में है कि अलग-अलग सोचने वाले लोग भी एक दूसरे के योगदान और विचारों का सम्मान करना सीखें ।समकालीन राजनीतिक विमर्श के लिए यह जरूरी है
संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने कार्यक्रम का संयोजन करते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से आमजन में पुस्तक पढ़ने की प्रवृति का विकास करना है।
कार्यक्रम में मधु आचार्य, गजानंद व्यास, नदीम अहमद, माणक सुथार, महेश उपाध्याय, अविनाश व्यास, आनन्द पुरोहित, जाकिर अदीब, सुनिता श्रीमाली, प्रमोद शर्मा, मनन, आनन्द छंगाणी, उषा बिस्सा, दीक्षा व्यास, गोपाल व्यास, प्रवीण प्रजापत, मनीष जोशी, ओमप्रकाश सुथार, इमरोज नदीम, गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
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