पुष्करणा ओलंपिक सावा: लाखों के इनाम भी नहीं रिझा पाए युवाओं को,विष्णु रूपी परंपरा से मोहभंग!,परंपरा और सनातन धर्म की मर्यादा पर चोट? चिंतन का विषय

THE BIKANER NEWS:- बीकानेर:-बीकानेर की पहचान और ऐतिहासिक पुष्करणा सावा बीती रात (10 फरवरी) धूम-धाम और हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। पूरा शहर बाराती बना और करीब 130 से अधिक जोड़े (जिसमें 100 जोड़े पुष्करणा समाज से) परिणय सूत्र में बंधे। लेकिन, इस भव्य आयोजन की चमक के पीछे समाज के कर्णधारों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दीं। समाज की प्राचीन ‘विष्णु रूपी दूल्हे’ की परंपरा को बचाने के लिए बड़े मंचों से की गई लाखों की घोषणाएं भी युवाओं को आकर्षित करने में नाकाम साबित हुईं।

मंच सजे, इनाम पुकारे गए, पर नदारद रहे दूल्हे
सावे को अनुशासित करने और कुरीतियों को मिटाने के उद्देश्य से शहर की बड़ी संस्थाओं और गणमान्य लोगों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। तीन बड़े मंचों से घोषणा की गई थी कि जो दूल्हा समय पर बारात निकालेगा और पारंपरिक ‘विष्णु रूप’ धारण कर मंच पर आएगा, उसे बाइक, नकद राशि और लाखों के इनाम दिए जाएंगे।
आयोजक करीब 3 से 4 घंटे तक टकटकी लगाए
दूल्हों का इंतजार करते रहे। स्थिति यह रही कि शाम 7:30 बजे के आसपास केवल एक दूल्हा विष्णु रूप में मंच पर पहुंचा, जिसे बाइक और 51,000 रुपये का इनाम दिया गया। पूरी रात के इंतजार के बाद, जहाँ 11 लोगों को पुरस्कृत करने का लक्ष्य था, वहां मुश्किल से 4 दूल्हे ही मंच तक पहुंचे। और कुल मिलाकर मुश्किल से 15-20 ही दूल्हे विष्णु रूप में नजर आए,तो क्या नवयुवकों का इनामो से मोह भंग हुआ है या फिर.?
संसाधनों की बर्बादी या दिशाहीन प्रयास
इस घटनाक्रम ने समाज के प्रबुद्ध जनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दबी जुबान में अब यह सवाल उठने लगे हैं कि लाखों रुपये जो इन बड़े मंचों और इनामों पर खर्च किए गए, क्या उनका उपयोग किसी जरूरतमंद कन्या के विवाह सहयोग में नहीं किया जा सकता था?
आलोचकों का मानना है कि केवल मंचों से आह्वान करने से समाज नहीं बदलता। धरातल पर घर-घर जाकर समझाने का जो प्रयास होना चाहिए था, वह नदारद रहा। यही कारण है कि न तो रीति-रिवाजों के लेन-देन में कमी आई और न ही युवाओं की मानसिकता बदली।
परंपरा और सनातन धर्म की मर्यादा पर चोट!
इस इनामी प्रतिस्पर्धा का एक और बड़ा दुष्प्रभाव देखने को मिला, जो सनातन धर्म और परम्पराओं के विपरीत है। मान्यताओं के अनुसार, जब दूल्हा बारात लेकर घर से निकलता है, तो वह पीछे मुड़कर नहीं देखता और न ही रास्ता बदलता है। लेकिन लाखों के इनाम के लालच में कई जगह यह देखा गया कि दूल्हे इनाम लेने के लिए मंच तक आए और फिर उसी रास्ते से वापस घूम गए। यह कृत्य न केवल परम्परा के विरुद्ध है, बल्कि सावे की धार्मिक शुचिता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
आत्ममंथन की जरूरत
जो बीत गया सो बीत गया, लेकिन आगामी सावे के लिए यह एक ‘वेक-अप कॉल’ है। समाज के गणमान्य और आयोजकों को अब मंथन करना होगा। क्या युवाओं का मोहभंग केवल आधुनिकीकरण है या हमारी दिशाहीन कोशिशें? सावे की गरिमा और पुरानी परंपराओं को जीवित रखने के लिए अब ‘लोक-लुभावन’ वादों की नहीं, बल्कि ठोस सामाजिक चेतना और ‘धरातल’ पर काम करने की आवश्यकता है।
फाइल फ़ोटो इमेज में इस्तेमाल की गई है



































