तीन पीढ़ियों से रावण के किरदार में आहूजा परिवार, 68 की उम्र में भी कायम है अभिनय का जुनून

बीकानेर। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की लीला में रावण का किरदार केवल एक खलनायक की भूमिका नहीं, बल्कि अभिनय, साहस और परंपरा का अनूठा संगम भी है। बीकानेर में आहूजा परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से रावण का किरदार निभाकर इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए है। परिवार की यह विरासत आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।इस अनूठी परंपरा की शुरुआत माधव दास आहूजा ने की, जिन्होंने 23 वर्षों तक रावण का किरदार निभाया। इसके बाद पूर्व आयकर अधिकारी शिवाजी आहूजा ने 25 वर्षों तक इस भूमिका को निभाकर अपनी अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया। अब बीकानेर के क्राइम रिपोर्टर के. कुमार आहूजा पिछले 23 वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं। इस तरह तीन पीढ़ियों से यह परिवार रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।रावण के किरदार में दिखता है अलग अंदाजबीकानेर दशहरा कमेटी की सजीव झांकियों में रावण का किरदार निभाते हुए के. कुमार आहूजा अपने विशिष्ट अंदाज से दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। रथ पर सवार होकर हाथ में धनुष लिए, टॉफी-बिस्कुट बांटते और अपनी बुलंद आवाज तथा भयंकर अट्टहास से भगवान श्रीराम को ललकारते हुए उनका अभिनय दर्शकों के लिए खास आकर्षण रहता है।शहर के परकोटे में जहां रावण की पूजा करने की परंपरा भी देखने को मिलती है और उन्हें भगवान शिव का महान भक्त माना जाता है, वहीं के. कुमार आहूजा रावण के इसी स्वरूप को आत्मसात करते हुए नन्हे बच्चों को आशीर्वाद भी देते हैं।
बहन की आन-बान के लिए राम से युद्ध करने वाला रावणरावण के किरदार के पीछे छिपी भावना को लेकर परिवार में भी एक रोचक प्रसंग जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि श्रीमती निर्मला आहूजा ने अपनी बड़ी बेटी रेखा से पूछा कि उसे राम जैसा भाई चाहिए या रावण जैसा? इस पर रेखा ने रावण जैसा भाई चाहने की बात कही। उनकी भावना थी कि रावण ने अपनी बहन की आन-बान और शान के लिए भगवान श्रीराम जैसे महान योद्धा से भी युद्ध किया और अपने प्राणों की परवाह नहीं की।यह प्रसंग रावण के चरित्र के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें बहन के प्रति प्रेम और उसके सम्मान की रक्षा का भाव प्रमुखता से उभरता है।परिवार को अपनी विरासत पर गर्वके. कुमार आहूजा की दत्तक मां श्रीमती रेखा केसवानी समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनके भाई बीकानेर में तीसरी पीढ़ी के रावण के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। वहीं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कांता आहूजा को लोग स्नेहपूर्वक ‘मंदोदरी भाभी’ के नाम से पुकारते हैं। परिवार के लिए यह पहचान सम्मान और गौरव का विषय है।श्रीराम के चरणों में प्राण त्यागना आखिरी सपना68 वर्षीय के. कुमार आहूजा आज भी रावण के किरदार को उसी उत्साह और समर्पण के साथ निभाते हैं। उनका कहना है कि उनका एक सपना है—राम के साथ युद्ध करते-करते भगवान श्रीराम के चरणों में ही उनके प्राण निकल जाएं। वे इसे अपने जीवन का अंतिम सपना मानते हैं।आहूजा परिवार की तीन पीढ़ियों की यह यात्रा बताती है कि रंगमंच केवल अभिनय नहीं, बल्कि विरासत, समर्पण और संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। बीकानेर की रामलीला परंपरा में इस परिवार का योगदान इसे और विशिष्ट बनाता है।जय लंकेश! जय श्रीराम!





































